Monday, July 27, 2015

फ‌‌िक्र ब‌िजनौरी

पब्ल‌‌िक इमोशन में 26 जुलाई के अंक में   फ‌‌िक्र ब‌िजनौरी पर एक लेख प्रका‌श‌ित
हुआ।लेख उपयोगी है  और नीचे द‌िया  जा रहा है।


Wednesday, July 8, 2015

पारसनाथ का किला

निम्न लेख मेने अमर उजाला   के लिए १९८५ के  आसपास लिखा था । लेख के प्रकाशन के बाद जैन समाज सक्रिय हुआ । आज यहाँ भव्य मंदिर है  

बिजनौर जनपद के बढ़ापुर क्षेत्र में स्थित पारसनाथ के नाम से विख्यात किले के अवशेष लंबे समय पुरात्ववेत्ताओं को लंबे समय से खोज के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। किंतु सदियों पुराने इस किले की प्राचीनता का पता लगाने में एवं किले तथा आसपास के क्षेत्रों में बिखरी पड़ी पुरात्व के महत्व को वस्तुओं को संजोकर रखने में किसी ने रूचि नहीं दिखाई है।
बढ़ापुर से लगभग चार किलोमीटर पूर्व में ग्राम कांसीवाली में पारसनाथ के किले के नाम से विख्यात स्थान है। २०-२५ एकड़ में बने इस किले के अब तो खंडहर ही रह गए हैं। जगह-जगह टीले दिखाई देते हैं। इन टीलों पर उगे वृक्ष एवं झाड़ एवं झनकाड़ के बीच पुरानी ईंट तथा खूबसूरत नक्काशीदार शिलाएं बिखरी पड़ी हैं। किले को देखने से ऐसा लगता है कि कि इसके चार द्वार रहे होंगे। उत्तर की ओर किले क्षेत्र में प्रवेश का रास्ता इसका प्रमुख द्वार होगा। किले के चारों ओर की बाउंड्री वॉल ढह गई है किंतु टीलों को देखने से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे काफी ऊंची रही होगी एवं इतनी चौड़ी कि उस पर एक ट्रक आराम से चल सके। कोनों पर अब भी गुमटियों के कुछ अवशेष हैं।
ग्राम काशीवाला के नक्शे में किले के बाहर एक पांच मीटर की खाई अभी भी दर्ज है। इस खाई को भर कर कृषकों ने खेती शुरू कर दी है। पर लगता यह है कि अन्य किलों की भांति इसके चारों ओर पांच मीटर चौड़ी गहरी खाई रही होगी। जिसमे सदैव पानी भरा रहता होगा। ताकि हमलावर किले की दीवार तक न पहुंच सके।
क्षेत्र में जगह-जगह नक्काशी किए हुए शिलाखंड पड़े हैं। शिलाखंडों को देखने से यह लगता है कि इनसे किले के मुख्य द्वारा बनाए गए होंगे। सदियों पुरानी इन शिलाओं पर विभिन्न प्रकार की आकर्षक आकृतियां भी बनी हुई हैं जो उस समय की कला की उन्नति की परिचायक हैं। किले के अंदर के क्षेत्र में जगह-जगह टीले बने हैं। हालांकि कुछ लोग यहां थोड़ी खेती कर रहे हैं। पर टीले होने के कारण वे सफल नहीं हो रहे। यहां तो झाड़ झंकाड़ तथा घास फूस ज्यादा हैं जो पशुओं को चराने के काम आती हैं।
एक टीले पर एक ऐसा पत्थर एक पत्रकार को मिला जिसे देखने से लगता है कि ये पत्थर किसी शिवलिंग का भाग होगा एवं शिवलिंग पर चढ़ाने वाले जल की निकासी के लिए इसका प्रयोग होता होगा। पत्थर की लंबाई करीब एक मीटर तथा चौड़ाई करीब छह इंच है। पत्थर के बीच की लंबाई कम करके पानी के जाने का रास्ता बनाया गया है। इसी तरह का एक पत्थर बिजनौर शहर से दो किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित माता के मंदिर के समीप बने शिव मंदिर पर मिल चुका है। किले के बाहर एक खेत में भगवान पारसनाथ की एक खंडित विशाल प्रतिमा पड़ी है। इसी तरह की प्रतिमा कुछ वर्ष पूर्व नहटौर नूरपुर मार्ग के समीप एक खेत में मिल चुकी है।
हालांकि क्षेत्र के लोगों का मानना है कि इस किले से जो भी व्यक्ति कुछ प्रतिमा आदि उठाकर ले गया वह बर्बाद हो गया। किंतु ऐसा लगता नहीं। किले के अवशेषों को देखने से लगता है कि इस क्षेत्र में मिलीं पुरात्व की वस्तुएं लोगों द्वारा ले जाई जाती रही हैं। कुछ धर्मांध व्यक्ति भले ही ले जाने से डरें पर यहां की संपदा वर्षों से लूट रही है। अब तो मात्र वह प्रतिमा और पत्थर खंड ही पड़े हैं जो काफी खंडित हैं या अत्यधिक वजनी, जिन्हें उठाकर ले जाना संभव नहीं है।
इस किले के बारे में कोई सही जानकारी भी नहीं मिली। बिजनौर जनपद के १८०८ के गजेटियर में इतना ही उल्लेख मिलता है कि बढ़ापुर से तीन मील पूर्व में पुराने किले पारसनाथ के अवशेष हैं। इसके चारों ओर की बाउंड्री ही पहचान वास्तव में इधर-उधर बिखरी पड़ी ईंटों एवं प्रतिमाओं के निर्माण संबंधी खंडों से ही होती है। वनों में निर्मित इस प्रकार के किलों की भांति इसके बारे में भी कुछ पता नहीं चलता। लेकिन यह माना जाता है कि यह जैन धर्म से संबंधित अवशेष हैं। तथा यह माना जाता है कि यह किलो जैनियों के प्रमुख तीर्थंकर पारसनाथ नाम संबंधित है।गजेटियर में कहा गया है कि यह निश्चित है यह किला इस क्षेत्र की प्राचीन समृद्धि का भाग है। तथा जनपद में बने मोरध्वज के किले के समकालीन है।
महावीर निर्माण समिति उत्तर प्रदेश द्वारा वर्ष ७५ में प्रकाशित महरावीर स्मृति ग्रंथ में इस किले के बारे में कहा गया है कि बढ़ापुर से तीन मील दूर पूरब में डेढ़ दो किलोमीटर में खंडहरयुक्त टीले हैं। इन्हें खोजा तो नहीं गया किंतु खंडित, अखंडित तीर्थंकर प्रतिमाएं, कलापूर्ण तीर्थंकर पटटपान स्तंभ, जिन प्रतिमाओं से अलंकृत दरवाजों के सिरदल तथा अन्य कलाकृतियां प्राप्त हुई हैं। एक तीर्थंकर प्रतिमा में भगवार पार्श्वनाथ की एक विशालकाय प्रतिमा है जो बढ़ापुर में गांव में प्राप्त हुई है तथा तीर्थंकर ऋषभ देव व संभवनाथ, चंद्र प्रभु, शांतिनाथ, नमीनाथ तथा महावीर की प्रतिमाएं हैं। एक खंडित किंतु अत्यंत कलापूर्ण शिलापट पर केंद्र में एक तीर्थंकर पद्यासनस्थ हैं। उनके बायीं ओर दो खड़गासन तीर्थंकर प्रतिमाएं हैं। इनमे एक सप्त कलाकृत है। अतएव निश्चित रूप से ये तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा है। दूसरी संभवत:नेमीनाथ की हो। दायें भाग में भी इसी प्रकार की दो प्रतिमाएं होंगी। किंतु यह भाग टूट गया है। पूरा लिपि ब्रह्मीय है।
प्रोफेसर कृष्णदत्त बाजपेयी ने इसे विक्रमी संवत १०६७ अर्थात सन १०१० का अनुमान किया है। किंतु लेख को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि संभवत: जिसके अनुसार यह लेख प्रतिमा पट्ट सन ५४० का होना चाहिए। लेख की भाषा और लिपि भी ११वीं शताब्दी की न होकर गुप्तांचर काल छठीं सातवीं शती की जैसी प्रतीत होती हैं। इस स्थान से गंगा यमुना के मूर्तियुक्त द्वार की चौखट के अंश भी मिलते हैं। जिनका प्रचलन गुप्त काल में हुआ था। गुप्तकाल की कई अन्य कलाकृतियां भी इस स्थान से प्राप्त हुई हैं। अत:यह स्थान गुप्त काल जितना ही प्राचीन है। और ११वीं व १२वीं शती तक यहां अच्छी बस्ती रही प्रतीत होती है।
ये निविध तथा जैन कलाकृतियां कई जैन मंदिर तथा एक अच्छे जैन अधिष्ठान मठ या बिहार के चिंह हैं तथा यह सूचित करते हैं कि गुप्तोचर काल में यह स्थान एक समृद्ध एवं प्रसिद्ध जैन केंद्र रहा होगा।
इस स्थान से प्राप्त तीर्थंकर प्रतिमाएं भी सभी दिगंबर हैं जैसा कि मध्यकाल से पूर्व प्राय:सभी जिन प्रतिमाएं होती थीं। पूर्वाक्त बढ़ापुर वाली विशालकाय पार्श्व प्रतिमा घरणेंद्र पद्यावती समंवित हैं। उसका घरणेय फणमंडल भी दर्शनीय है। और सिंघासन पर सर्प की फनदार कुंडलियां दिखाई गई हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि पारसनाथ किले के मुख्य जिन प्रसाद की मूल नायक प्रतिमा रही होगी और किस प्रकार यह प्रतिष्ठित की गई होगी। उस प्रकार भगवान पार्श्वनाथ के उपसर्ग की घटना और उस स्थान के साथ-साथ संबंध रखने की बात स्थानीय जनता की स्मृति में सुरक्षित थी।
बिजनौर के वर्धमान स्नातकोत्तर महाविद्यालय के इतिहास के विभागाध्यक्ष डा. सत्यप्रकाश का कहना है कि प्राचीन काल में मथुरा से अहिछत्र रामनगर मुरादाबाद से ऊपर होकर तराई में पारसनाथ होकर मार्ग मायापुरी आज का हरिद्वार तक जाता था। प्राचीन काल में व्यापारी लुटेरों के डर से बड़े बड़े सुरक्षा दस्तों के साथ व्यापारिक यात्राओं पर जाया करते थे। तथा रास्तों में सुरक्षित जगहों पर रूकते थे। संभवत: यह स्थान व्यापारियों का पड़ाव स्थल रहा होगा और लुटेरों के हमलों से बचने के लिए यहां किला बनाया गया होगा। क्योंकि उस समय जैन व्यापारी ज्यादा थे। अत: उनकी आस्था के अनुरूप मंदिर तथा प्रतिमाएं यहां बनायीं और लगाई गई होंगी।
उनका मानना है कि इस पारसनाथ के किले क्षेत्र में पुरात्व संबंधी महत्वपूर्ण संपदाएं विद्यमान होनी चाहिएं। उन्होंने बताया कि ७२-७३ में उनके कॉलेज से सरकार को प्रस्ताव गया था कि पारसनाथ के किले से प्राप्त सामग्री का संग्रह की वर्धमान कॉलेज में करके पुरात्व संपदा की रक्षा की जा सकती है। पर सरकार के स्तर से इस पर कोई भी कार्रवाई नहीं हुई।
ग्राम काशीवाला के रहने वाले मनोहरजीत सिंह ने इस पत्रकार को यह किला दिखाया था। उन्होंने किले से उत्तर और पूर्व के किनारे पर लगभग एक फर्लांग दूर एक टीला दिखा तथा बताया कि यहां मंदिर रहा होगा। आज इस किले के पास छोटा सा तालाब स्थित है। उन्होंने बताया कि इस किले से प्राप्त शिवलिंग को पास के एक मंदिर में स्थापित किया गया है। उनका मानना है कि इस तालाब से किले तक सुरंग जाती थी। इस किले से रानियां आकर तालाब में स्नान करती एवं मंदिर में पूजा अर्चना करती थीं।
उन्होंने बताया कि किले क्षेत्र में आज भी दूर-दूर तक खेतों में कुएं बने हुए हैं। वह उस समय पानी निकालने के काम में आते होंगे।वह इस क्षेत्र की ऐतिहासिक के बारे में ये भी बताते हैं कि यह क्षेत्र काशीवाला के नाम से विख्यात है। तथा क्षेत्र के लोगों का मानना है कि आल्हा में विख्यात गढ़ कांसों की लड़ाई इसी क्षेत्र में हुई होगी।
अशोक मधुप