Tuesday, January 28, 2014

दुनिया के जूनियर आर्टिस्ट पी.के. साईल

28 जनवरी। पुण्यतिथि है दुनिया के जूनियर आर्टिस्ट पी.के. साईल डा. वीरेंद्र स्योहारा। फिल्म इंडस्ट्रीज के ट्रेजिडी किंग दिलीप कुमार की फिल्म मेला में ये जिंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे, अफसोस हम न होंगे-गाना जिस फकीर पर फिल्माया गया वो आज भी लोगो की याद में जिंदा है। लेकिन शायद ही किसी को मालूम हो कि इस फकीर की एङ्क्षक्टग करने वाला कलाकार स्योहारा का था। नाम था महमूद। बचपन में मां -बाप का साया सर से हट जाने के बाद महमूद ११ वर्ष की उम्र में पूना चले गये ।यहां पेट की आग रंगमंच तक ले आई। कुछ वर्षों तक उस समय के प्रसिद्ध कव्वाल बाबू भाई की कम्पनी में सहायक कव्वाल के रूप में काम कर अलग पहचान बनाई। कम्पनी का मुम्बई में प्रोग्राम होने पर महमूद को मुम्बई इतनी पसंद आई की ये वहीं रम गये। उस समय बन रही साईलैंस फिल्मों में काम किया। जब बोलती फिल्म आनी शुरू हुई। पहली बोलती फिल्म आलम आरा में महमूद ने काम किया। उसी समय उन्होंने अपना नाम पी.के. साईल रख लिया था। जूनियर आर्टिस्ट एसोसिएशन के सदस्य बन चुके थे। उन्होंने मुम्बई में ही एक मुस्लिम महाराष्टन से शादी कर ली। उनके एक बेटी और एक बेटा पैदा हुआ। मेला फिल्म में उस फकीर का रोल मिला जिसपर ये जिंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे, अफसोस हम न होंगे फिल्माया गया। उसके बाद उन्होंने ५० वर्षों तक ७३ से भी अधिक फिल्मों में अभिनय किया। पी.के. साईल को सोहराब मोदी से लेकर दिलीप कुमार जैसे कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने पुकार, मुगलेआजम, गंगाजमना, उड़नखटोला, मेला, पाकीजा, संगम, आजाद, लुटेरा, आंखे, संघर्ष, मिर्जा गालिब, पालकी, मेरे महबूब, कोहिनूर, बरसात, जिस देश में गंगा बहती है, फौलाद, वक्त, गूंज उठी शहनाई, सुसराल, दीवाना, पिंजरे के पंछी, हरियाली और रास्ता, शहीद आदि फिल्मो में काम किया। पी.के. साईल की बेटी की मौत के बाद उनका मन मुम्बई से उखड़ गया, और वे १९६७ में सपरिवार अपने वतन स्योहारा वापस आ गये। जहां २८ जनवरी २००१ को उनका निधन हो गया। उनके पुत्र मुहम्मद आरिफ पेंटर ने बताया कि उनके पिता मुम्बई से वापस तो आगये लेकिन फिल्मों में आज भी वो जिंदा हैं। वो कहा करते थे, हमतो मर जाएंगे यही नियति है, तुम हमे याद करो एक तमन्ना है यही। डा. वीरेंद्र