Sunday, April 24, 2011

उर्दू अदब के बेताज बादशाह



किरतपुर में जन्मे थे इजहर असर

अदब की दुनिया के प्रख्यात नाम इजहर असर का बिजनौर जनपद के किरतपुर में 15 जून 1927 में जन्म हुआ था। इजहर असर का 15 अपै्रल को दिल्ली में निधन हो गया। इनका बचपन का नाम मुहम्मद इजहारूल हसन और इनके पिता का नाम मुख्तार अहमद था। दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के प्रवक्ता खालिद अलवी का कहना है कि हिंदी साहित्य में जो स्थान गुलशनंदा को प्राप्त है, वही स्थान उर्दू अदब में इजहर असर को है। किरतपुर से वह लाहौर चले गए और लंबे समय तक वहीं रहे। वे बंटवारे के समय दिल्ली आकर बस गए। उन्होंने असर किरतपुरी के नाम से भी लिखा।

प्रोफेसर खालिद अलवी के अनुसार बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि वे एक बड़े शायर भी थे। प्रसिद्ध शायर ताजवर नजीबाबादी के शिष्य थे। ताजवर नजीबाबादी अपने समय के सबसे बड़े विद्वान थे और लाहौर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। प्रोफेसर अलवी बताते हैं कि असर ने उनसे बताया था कि रात को ताजवर की महफिल में बुखारी भाई(आजादी से पूर्व आल इंडिया रेडियो के डाइरेक्टर) फैज और सूफी तबस्सुम भी शरीक होते थे। उनमें मैं इजहर असर उम्र में सबसे छोटे थे। महफिल खत्म होने पर ताजवर कहते, असर रात बहुत हो गई, चलो मैं तुम्हें घर छोड़ आऊं। जब मेरे कमरे पर आ जाते तो मैं कहता उस्ताद आप अकेले जाएंगे, चलो मैं आपको थोड़ी दूर तक छोड़ आऊं। यहां तक की उनका घर आ जाता। फिर उस्ताद कहते। अरे बातों में घर आ गया, चल तुझे छोड़ आऊं। इसी तरह सबेरा हो जाता। इस दौरान उस्ताद शायरी के नुकते समझाते रहते।

बुशारत संकलन

इजहर की शायरी का संकलन बुशारत के नाम से प्रकाशित हुआ। असर तरक्की पसंद शायर थे। प्रोफेसर अलवी कहते हैं कि इसी कारण मुझे कई बार सरदार जाफरी और प्रोफेसर कमर रईस से बात का मौका मिला।

असर के कुछ अशआर

ड्

कभी ये खुशबू कभी मुझको कोई ख्वाब लगा, तेरा बदन मुझे शेरों का इंतखाब लगा,

ड्ड

बदन की प्यास सजा ली थी मैने पलकों पर, जबां से कहते हुए तो मुझे हिजाब लगा। (संबंधित फोटो 8 पर भी)

विज्ञान के पहले उपन्यासकार थे असर



बिजनौर/किरतपुर। आमतौर से कहा जाता है कि उर्दू अदब सिर्फ गजल लेखन तक सीमित है या थोड़ा बहुत लेखन बस, लेकिन इजहर असर ने पहली बार विज्ञान विषय पर उस समय उपन्यास और कहानी लिखी, जब इस विषय पर हिंदी और बंगला में भी लेखन की शुरुआत नहीं हुई थी।

पांचवें दशक में जब विज्ञान विषय की तालीम भी बहुत कम थी, तब उन्होंने आधी कयामत नाम से साइंस विषय पर उपन्यास लिखा। यह बहुत चर्चित जासूसी उपन्यास था। इसमें पहली बार एक रोबट दिखाया गया था। उस समय इंडिया में रोबट को जानने वाले भी बहुत कम लोग थे। इजहत असर ने इस रोबट को सोचने और समझने और जजबात महसूस करने की ताकत दी। यह रोबट एक हसीना के इश्क में गिरफ्तार होकर अंत में आत्महत्या कर लेता है। अजहर ने लगभग 30 साल तक अनोखा जासूस नाम से मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया। इस रिसाले के जासूस का नाम बहराम था। बंबई का रहने वाला यह प्राइवेट जासूस बहराम अपने दोस्त जिंदल की जान बचाने के लिए एक बार चंद्रमा का सफर भी करता है। वहां रूस और अमेरिका की राजनीति का शिकार हो जाता है, फिर अपनी बहादुरी और अकलमंदी से अपनी जान बचाकर और दुनिया को तबाह करने वाला फार्मूला चुराकर भाग आता है,लेकिन अपने दोस्त जिंदल को लाना नहीं भूलता।

असर ने आधी कयामत, अनोखा जासूस जैसे छह सौ से भी अधिक उर्दू उपन्यास लिखे। इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार उर्दू में विज्ञान विषय पर उन्होंने सर्व प्रथम कलम उठाई। और पचास से ज्यादा नावेल लिखे।

मेरे अफसाने नाम से प्रकाशित हुआ लगभग तीन से अधिक कहानियों का उनका संग्रह बहुत ही लोकप्रिय हुआ।

‘शमा’ प्रकाशन से निकलने वाली महिलाओं की पत्रिका में उनके उपन्यास धारावाहिक रूप से छपे। इसी कारण उन्हें औरतों पर लिखने वाला लेखक भी कहा गया। उनके लेखों का एक संग्रह साइंस क्या है नाम से हिंदी तथा उर्दू में प्रकाशित हो चुका है। उनके द्वारा लिखा गया नाटक तीसरी आंख भी लोकप्रिय हुआ। उनकी सेवाओं के लिए उन्हें उर्दू अदब के बडे़ सम्मान गालिब अवार्ड से भी नवाजा गया।

किरतपुर। मुहल्ला मुफ्तियान में जन्मे उर्दू के ख्यातिलब्ध साहित्यकार इजहार असर किरतपुरी के इंतकाल से उर्दू जगत एक महान व्यक्तित्व से महरूम हो गया है। सोशल हेल्थ केयर सोसाइटी के महामंत्री डा. अब्दुर्रहमान रश्क के निवास पर हुई शोक सभा में अध्यक्ष डा. अहसानुल करीम प्रमोद गोयल, डा. एनएच मिर्जा, मास्टर मजहर नामी, सर्वेश अग्रवाल, डा. एम जुनैद, डा. एम. फैजान खां, मुहम्मद कुरैश, शुजाउद्दीन, रियाज अहमद मौजूद रहे।
 
 
AMAR UJALA KE BIJNOR DAK ME  23 APRIL ME PRAKASHIT MERA EK LELH