Saturday, November 29, 2008

बिजनौर जनपद की एक कला चाहरबैत


सुभाष जावा

सुभाष जावा जनपद के एक अच्छे लेखक हैं। मेरे अनुरोध पर यह लेख उनहोंने लिखा था, इसका यहां सदुपयोग किया जा रहा है



ढप कहीं बजता है तो लगता है कि कोई आशिक अपनी महबूबा की याद में तराना छेड़े हुए है या महबूबा की जुदाई से उसके अंदर की छटपटाहट शब्दों में व्यक्त हो रही है। 'दायरा' कहीं गूंजता है तो लगता है कि कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका की याद में उसके सपने संजोये उसके रूप को अपने तरन्नुम में निहारता उसके इंतजार में पलके बिछाये है। कहीं 'चंग' की थाप पर मोहब्बती लहजे में प्रेयसी के शिकवे-शिकायत है, तो कहीं माशूक की बेवफाई के चर्चे तो समझिये ऐसी गायन विद्या कुच्छ और नहीं 'चहार बैत' है। 'चाहर बैत' उर्दू नज्म का ही एक रूप है। जिसका शाब्दिक अर्थ 'चहार' अर्थात चाहर व 'बैत' अथवा पंक्तियां यानिं चार पंक्तियों वाली कविता। उर्दू व्याकरण की दृष्टि से चहार बैत में पहली दो पंक्तियां मतला कहलाती हैं यानि प्रथम पंक्ति मिसरए अला, दूसरी पंक्तिञ् मिसरए सानी। इसके बाद एक बंद होता है। जिसकी चार पंक्तियाँ होती हैं। इन चार पंक्तियों में पहली तीन पंक्तियां तुकांत होती हैं और अंतिम चौथी पंक्ति मतले के अनुरूप ही बहार में 'तुकांत' होती है। अंतिम बंद में कभी-कभी शायर अपने नाम अथवा तखल्लुस (उपनाम) का भी प्रयोग करता है। जिसे मक्ते का बंद कहते हैं, उदाहरणार्थ-स्व. शायर राही हमीदी की ये चहार बैतः-


'मेरा दिल तोडक़र ऐ जाने वालों मेरी महफिल से'(फिसरए अली)


तुम्हारी याद बरसो जा न पायेगी मेरे दिल से। (मिसरए सानी)


वो दिन भी आएगा उम्मीद है गर्दिशे दौरां,


तुझे भी अखरश होना है जब मिन्नतकशे अहसां,


हर एक जालिम दिखाई देगा सर से पांव तक हैरां,


लहू का एक इक कतरा लिया जायेगा कातिल से। -बंद,


मैं उस मासूम कातिल की खतायें माफ कर दूंगा,


दिले काफिर में अपने यार का एक नूर भर दूंगा,


उसे मैं कत्ल करने को दुबारा अपना सर दूंगा,


गर महशर में 'राही' सामना हो जाये कातिल से- मक्ता


चहार बैत को यदि श्रेणीबद्ध किया जाये तो इसको पांच रूपों में रखा जा सकता है। जिसमें पहला रूप 'हम्द' है, जो केवल अल्लाह की शान में पढ़ी या गायी जाती है, दूसरी 'नात' है जो रसूले पाक सलललाहो आले हे वसल्लम की शान में गायी जाती है, तीसरा 'नोहा' (मनकबत) है जो शहीदाने करबला की शुजात (वीरता) में पढ़ी जाती है। चौथा रूप 'कसीदा' है, जो किसी भी व्यक्ति विशेष की तारीफ में गाई जाती है। पांचवा रूप 'बरसाती' है जो एक प्रकार से विरह लोक शैली या गीत पर आधारित है, छठी 'आशिकाना' है जो महबूबा की तारीफ या मोहब्बत के खट्टे-मीठे अनुभवों पर आधारित होती है। चहारबैत सामूहिक रूप से गायी जाने वाली विधा है, जिसको गाने वाली टोली अथवा जलसे में औसतन सात या आठ सदस्य होते हैं। जिनमें कुछ कें हाथों में ढफ,'दायरा', सर 'चंग' 'ढपली' के आकार व रूप का वाद्य यंत्र होता है। शेष साथी लोग अपने हाथ की हथेलियां बजा-बजाकर टोली का साथ देते हैं और टोली को लय प्रदान करते हैं। गाने वाली टोली का मुखिया पहले गाने की शुरूआत करता है, जिसके बोलों या शब्दों को साथी लोग सुर व लय देकर उठान प्रदान करते हैं तथा साथ ही अपने हाथों, आंखों और कभी-कभी घुटनों कें बल खड़े होकर लगाकर अपने भावों को अभिव्यक्त या प्रदर्शित करते हैं। शायद इस कारण चहारबैतको महाजराती फन या परफारमिंग आर्ट भी कहा जाता है।यद्यपि चहार बैत लगभग चार या पांच सौ से भी अधिक साल पुरानी गाई जाने वाली विधा है, जिसका क्षेत्र भारत में अति सीमित है और मात्र टोंक (राजस्थान), भोपाल (मध्य प्रदेश), गोवा, रामपुर, शाहजहांपुर रूहेलखंड)


, मुरादाबाद, अमरोहा, बछरायूं व चांदपुर (बिजनौर) में ही लोकप्रिय है। चहारबैत का कोई क्रमबद्ध इतिहास तो उपलब्ध नहीं है, किंतु माना जाता है कि चहारबैत का प्रारंभ अफगानिस्तान या अरब देशों कें किसी नखलिस्तान से हुआ। जहां कभी एक चरवाहा अपने पशु चराता अपना समय गुजारने हेतु पेड़, की डंडी से पेड़ों के पत्तों को खनखनाता, कुछ गाता फिरता था। वही उसे कभी किसी पशु की सूखी नाल मिली जिसे उठाकर पीटते उसे किसी सुर का अहसास हुआ और अब उसने उस खाल के चारों ओर बाकायादा कुछ डंडियां बांधी तथा उसको पीटने की आवाज से तरह-तरह की आवाजें निकाल कर लोगों को आश्चर्यचकित किया। इस प्रकार ये गाना व बजाना चरवाहे की दैनिक क्रियाआेंमें शामिल हो चुका था। एक दिन उस रास्ते से गुजरने वाले किसी काफिले को गान -बजाने के अंदाज ने इतना आकर्षित किया कि उस काफिले के सरदार ने तत्कालीन क्षेत्रीय बादशाह से रास्ते का वृतांत सुनाकर चरवाहे को दरबार में बुलाकर उसका गाना-बजाना सुनने की फरमाइश की। फलस्वरूञ्प जब ladaqe को दरबार में बुलाकर उसका गायन व उस खाल का बजाना सुना गया तो बादशाह बहुत खुश हुआ और उसने उस चरवाहे को कुछ सिक्के देकर puraskrit किया और उसे खलीफा की उपाधि से भी सुशोभित किया। इस प्रकार आगे चलकर टोली का मुखिया खलीफा कहलाया तथा बजाने वाला वह यंत्र दफ, दायरा या चंग कहलाया। शनै-शनै यह विधा काफिलों के द्वारा एक कबीले से दूसरे कबीले व दूसरे कबिले से तीसरे कबीले तक पहुंचती रही। जिसका भारत में इसका आगमन सर्वप्रथम रूहेलखंड के रामपुर क्षेत्र में हुआ। जहां अफगानिस्तान के पठानों के कबीले अक्सर आकर ठहरते थे तथा रात्रि में सर्दी से बचने और अपना समय व्यतीत करने हेतु अलाव जलाकर उसके चारों ओर बैठकर आग तापते दायरा बजाते तो कुछ गाते रहते थे। कहा जाता है कि पटानों का यही गायन पहले पठानिया राग कहलाया, जिसका विकसित रूप ही कालांतर में चहारवैत कहलाया। कुछ चहारवैत प्रेमी इस विद्या को इस्लाम धर्म से जोड़ते हैं। uktaa मतावलंबियों में चहारवैत के प्रसिद्ध गायक अय्यूब आलम का मानना है कि चहारवैत की शुरूआत अरब देश के पवित्र शहर मदीना से उस समय हुई जब हजरत मौहम्मद साहब ने मक्का से मदीना के लिए हिजरत (पलायन) लगभग 1419वर्ष पूर्व की। तब मदीनावासियों ने अपने चहेते मौहम्मद साहब की शान में दायरा बजा--बजाकर कुछ गा-गाकर उनका स्वागत किया। शायद इसी कारण इस्लाम धर्म में दफ या दायरे से उपजा सुर या संगीत ही जायज है और यही से यह विद्या पखतुनिस्तान (अफगानिस्तान) और फिर वहां से रूञ्हेलखंड (भारत) पहुंची। चाहर वैत गायन विद्या की अपने आप में एक विशेषता यह है कि इसके जलसों में आपसी मुकाबले होते हैं। ये मुकाबले कभी स्थानीयस्तर, तो कभी व्यापक स्तर पर होते हैं। जिनमें सम्मलित टीमें अपनी-अपनी बारी से अपना कलाम सुनाती हैं और आयोजन में niyuktaa जजो के बहुमत कें आधार पर या जनता की वाहवाही की कसौटी के आधार पर सर्वश्रेष्ठ टीम घोषित कर क्रमशः पुरस्कृत किया जाता है। प्रायः यह भी देखने में आया है कि आयोजन में सम्मलित हर जलसा अथवा टोली अपने गायन की shurooaat 'नातिया' कलाम से करती है। तत्पश्चात 'आशिकाना' चहार वैत का गायन होता है। चहार वैत के ये मुकाबले टोंक (राजस्थान), रामपुर, मुरादाबाद, अमरोहा, चांदपुर व बरछायूं में अक्सर होते रहते हैं। जहां यदा-कदा गोवा की एक मात्र टीम भी भी भाग लेती है। प्रायः यह भी देखने में आया है कि जलसए चहार वैत केञ् मुकाबलों से पूव्र संबंधित टोलियां रात को baithkon व दिन कें समय नगर के समीप बागो में अपने गायन का अभ्यास (रियाज) किया करती है। संख्या या गणना की दृष्टि से सबसे अधिक टोलियां या जलसे या अखाड़े राजस्थान के टौंक कस्बे में है जिनकी संख्या चालीस से भी अधिक है जिनकी अधिकांश की विशेषता 'दायरा' या 'दफ' बनाने का कलात्मक ढंग से जिनके सुनने मात्र से ही लोग झूम उठते हैं। इन अखाड़ों में खलीफा उबैद खां का अखाड़ा देश के विभिन्न अखाड़ों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाये रखने में सफल है। दूसरा स्थान रामपुर का है जहां के अखाड़ों की संख्या लगभग बीस है। जिनमें खलीफा मंजू खां, मौ. अहमद, धम्मन खा, बाबू मियां व हाजी बच्चन के अखड़े अपनी पहचान बनाने में कामयाब हैं। तीसरा स्थान मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का है। वहां के जलसों की संख्या दस है। जिनमें हाजी छज्जन मियां का अखाड़ा प्रसिद्ध है। चौथा स्थान जनपद बिजनौर का है। वहां के जलसों की संख्या छः है जिनमें मुख्यतः उस्ताद खंजर, साहबजादा के जलसे उल्लेखनीय है। पांचवे स्थान पर कस्बा चांदपुर आता है। यहां के अखाड़ों की संख्या चार है। जिनमें खलीफा मुंशी अंजारूञ्द्दीन वीसर, उस्ताद जफरूञ्ल इस्लाम मरहूम, खलीफा इकबाल अहमद व खलीफा मुंशी हनीफ मरहूम के नाम काबिले जिक्र है। छठे स्थान पर अमरोहा है, अमरोहा के अखाड़ों की संख्या तीन है। इनमें उस्ताद मुसब्बिर हुसैन का अखाड़ा प्रसिद्ध है, सातवां स्थान छोटे से कस्बे बछरायूं का है, वहां का एक मात्र जलसा खलीफा अब्दुल वहीद का है। चाहरबैत से खलीफा जफरूल इस्लाम मरहूम के जलसे के मुख्य गायक रईसुल इस्लाम ने बताया कि वे जिन शायरों की चहारबैत गाते हैं। उनमें मुख्यतः हाजी हजुन मियां भोपाल, मोहम्मद इस्माइल रामपुर, शैदा मुरादाबादी, हकीम नवी बख्श 'शाहिल' अमरोहा, चौधरी अहसान खां बछरायूं, सय्यद इनायत रसूल 'मतीर' झालू व चांदपुर के प्रसिद्ध शायर मुंशी हामिद, हकीम अजमत अली शैदा, राही, हमीदी, मुंशी दशमतुल्ला 'आशिक', मलिक इरफान 'मलिक', नईमुद्दीन असर, साहिर 'चांदपुर' आदि हैं। जलसए चहार वैत में जिन चहार वैत केञ् गाने का प्रचलन है या जो सब जगह आमतौर पर गायी जाती है। उनमें मुंशी हामिद खां (चांदपुर) की चहारबैत निम्न लिखित है।


'आंसू ना बहा अश्को से दामन कोना तर रख' मिसराए उला





आशिक है अगर सीने में पत्थर का जिगर रख।मिसरए सानी मतला


........रहबर का भरोसा नहीं कब छोड़ ke चल दे,


मजबूत इरादे तेरे पैरों से कुञ्चल दे,


दुश्मन ये नजर रखने का माहौल बदल दे,


इस दौर में अपने ही मुहाफिज ये नजर रख।बंद......


..'हामिद' कोई रहवर काकोई नक्षे कड्डेञ् पा,


दस्तूर निराला है रहे mulke अदम का,


आ जाये कब उस राह का मुझको भी बुलावा,


हर वक्त लपेटे हुए सामाने सफर रख।


मक्त शैदा चांदपुरी की पंक्तिञ्यां,'


शमशीर केञ् कホजे पर कातिल ने किया कホजा,


सर तन से जुदा होंगे हैं कत्ल की तैयारी।'
तालिब चांदपुरी की पंक्तिञ्यों ' कतारी थी छुरी भी तीर था बरछी ािी खंजर था, जिगर पर सैकड़ों चोटे भी जब बेपर्दा दिलवर था'


मलिक इरफान मलिक की पंक्तिञ्यां


' किया है दिल जिगर दोनों कबाब अहिस्ता-अहिस्ता,
है मेरी जान पे लाखों इताब आहिस्ता-आहिस्ता।
' हशमतुल्ला ' आशिक' के मतले की पंक्तिञ्यों कि


'गलती से आज खाई है हमने जिगर की चोट,


ये एक दिन की चोट है वो उम्र भर की चोट।' आदि हैं। इसके अतिरिक्त मसूद हाशमी भोपाली की चहार वैत प्रसिद्ध शायर कैञ्फ भोपाली की गजल के निम्र मतले पर आधारित है '


हाए लोगों की करम फरमाइयां, रूञ्सवाइयां।
रईस अमरोहवी की चहार वैत जो वैत जो अहमद फराज की ग़ज़ल पर आधारित हैः-'रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ,आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।'टौंक (राजस्थान) के शायर व खलीफा की पंक्तिञ्यां, 'दमे रूख्सत जब उनकी आंख तर होगी तो क्या होगा, अभी तो रात बाकी है सहर होगी तो क्या होगा।' व ' मेरी मंजिल, तेरी महफिल, तेरी महफिल, तेरी महफिल।' शायर शादां बछरायूंनी की चहार वैत 'भूल गया सय्याद सितमगर डाल के मुझको कैंञ्दे कफस में,


देखिये कब दिलाएं मुकद्दर मौसमे गुल को कितने बरस में।'


, रामपुर केञ् शायर चौधरी अहसान अली की बरसाती चहार वैत जो इस प्रकार है


'हर घड़ी हर लहजा यार सीने से बाहम रहे


दिल थे ना कुञ्छ गम रहे बदू उस यार से


अपनी मुलाकात हो और ना कोई बात हो,
सहने गुलिस्तां हो मौसमे बसात हो


यार अपने साथ हो, चलती हो पुरवाईयां


पड़ती हो हल्की ड्डुञ्हार, हर घड़ी, हर लहजा यार,


आब-ए-रवां हो कभी और कभी थम रहे


, दिल ये जा कुञ्छ गम रहे ताा


आशिक मुरादाबादी की निम्र चहार वैत है


' शामे तन्हाई का आलम भी अजब था,


दिले बेताब किसी तरह संभाला ना गया,


कभी सीने से लगाया कभी अंखों पे रखा,


खेल-खेले हे हजारों तेरी तस्वीर केञ् साथ।'


चहार वैत केञ् जलसों में चहार वैत गाने वाले व उनकेञ् श्रोताओं में अधिकांशतः मामूली पढ़े-लिチो, लेबर タलास केञ् लोग ही होते हैं तथा सマय समाज केञ् लोगों व अपेक्षाकृञ्त अधिक पढ़े-लिखे लोगों से चहार वैत का कोई लेना देना नहीं है। इस संबंध में पूछे जाने पर खलीफा इकबाल अहमद का कहना था कि यह सही है कि हमारे जलसो में अधिकतर मजदूर तबका ही शामिल रहता है। जिसका मुチय कारण यह रहा है कि बड़े व अच्छे शायरों ने इस विद्या की ओर तरीक भी ध्यान नहीं दिया तथा उल्टे इस विद्या की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया तथा उल्टे इस विद्या को उर्दू अदब का दुनिया से खारिज कर दिया। जिसकेञ् परिणामस्वरूञ्प पढ़ा-लिखा तबका भी चहार वैत से कटा रहा। चाहर वैत केञ् भविष्य केञ् संबंध में पूछे जाने पर खलीफा मुंशी अजरूञ्द्दीन तासीर व उस्ताद बल्लन का कहना है कि आज देश में मनोरंजन केञ् साधनों की भरमार है और लोगों को घर बैठे ही उनकी तफरीह का सामान मिल जाता है। इसलिए चहार वैत में उनकी रूञ्चि नहीं रह जाती, दूसरे आज व्यक्तिञ् को अपने घर परिवार की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति में ही अपना पूरा समय लगाना पड़ता है, फिर भी उनका मानना है कि जिस तरह आकाशवाणी नजीबाबाद, रामपुर और आकाशवाणी दिल्ली यदाकदा उनकेञ् प्रोगामों को प्रसारित किया है तथा प्रसारण सुनिश्चित किया है। उससे जलसों व श्रोताओं में नये उत्साह का संचार हुआ है जो चहार वैत केञ् भविष्य केञ् लिए अच्छे लक्षण हैं। खलीफा मास्टर रईस ने चहार वैत केञ् धूमिल होते भविष्य केञ् लिए जिला प्रशासन को दोषी ठहराते हुए उन पर इस विद्या की उपाो करने का आरोप लगाया और कहा कि जहां एक ओर जिलास्तर पर प्रशासन द्वारा अनेक महत्वपूर्ण अवसरों पर सांस्कृञ्तिक कार्यक्रञ्मों का आयोजन किया जा रहा है, वहां एक बार भी जलसए चहार वैत का आयोजन नहीं कराया गया। खलिफाओं को सबसे ज्यादा शिकायत दिल्ली व लखनउऊ दूरदर्शन से है, जिन्होंने मात्र एक बार ही कार्यक्रञ्म प्रसारित कर दोबारा कभी भी चहार वैत को प्रसारण सूची में शामिल नहीं किया। बहरहाल आज भी सマय समाज का चहार वैत विद्या से पूर्णतया उदासीन रह इसे मात्र जाहिल व्यक्तिञ्यों की तफरीह का सामान करार देना तथा देश केञ् प्रसिद्ध शायरों व लेखकों द्वारा इस विद्या को मान्यता न दे पाना इस विद्या केञ् भविष्य केञ् लिए सवालिया निशान हैं, साथ ही चहार वैत केञ् जलसे ीाी इस विद्या की दुर्दशा केञ् लिए स्वयं भी जिミमेदार है। タयोंकि अकसर देखने में आता है कि कभी-कभी टोलियों की व्यंग्यात्मक शैली मुखर हो जाने केञ् कारण विभिन अखाड़ों में आपसी कटुता इतनी बढ़ जाती है कि नौबत भद्दी गाली-गलौच,हाथा-पाई व लाठीडंडों से मारपीट तक आ जाती है। देखने में यह भी आता है कि चहार वैत केञ् अखाड़ों में अनिवार्य रूञ्प से शामिल मर्दाना माशूक की मौजूदगी भी यदा-कदा झगड़े का कारण बनती है। फिर जलसों में अनपढ़ श्रोताओं द्वारा गाने वालों को दाद देने का तरीका भौंडेपन पर आधारित दिााई पड़ता है। जब मात्र बारह वर्ष का लडक़ा एक बुजुर्ग गायक को वाह मेरे बेटे, वाह मेरी जान कहकर संबोधित करता है। उक्तञ् सबकेञ् रहते देखना है कि दिन-प्रतिदिन बदलते सांस्कृञ्तिक परिवेश में जब एंटीना कल्चर द्वारा मनोरंजन का नई-नई कलाओं व विद्याओं को प्रोतसाहित, विकसित व स्थापित किया जा रहा है। जिसकेञ् परिणामस्वरूञ्प पुरानी विद्याओं, कतआत, रूञ्वाईयां, कसीदे, मरसिया आदि लुप्त प्रायः हो रही है तब ऐसी स्थिति में चहार वैत विद्या अपने अति सीमित साधनों केञ् रहते अपनी लोकप्रियता, असतित्व व भविष्य को सुरक्षित रख पाने में कहां तक सफल हो जाती हैं।

Friday, November 28, 2008

बिजनौर जनपद

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